वाक्य-विचार किसे कहते है - वाक्य विचार के भेद और उदाहरण

वाक्य-विचार

वाक्य- सार्थक पदों (शब्दों) के उस समूह को वाक्य कहते हैं, जिसके द्वारा एक अर्थ या एक पूर्ण भाव की अभिव्यक्ति होती है। वाक्य सार्थक शब्दों का व्यवस्थित रूप है। शिक्षितों की वाक्य-रचना व्याकरण के नियमों से अनुशासित होती है।

वाक्य एक या एक से अधिक शब्दों का भी हो सकता है। भाषा की इकाई वाक्य है। छोटा बालक चाहे वह एक शब्द ही बोलता हो, उसका अर्थ निकलता है, तो वह वाक्य है। वाक्य-रचना में प्रयुक्त सार्थक पदों के समूह में परस्पर योग्यता, आकांक्षा और आसक्ति या निकटता का होना जरूरी है, तभी वह सार्थक पद-समूह वाक्य कहलाता है।

वाक्य की परिभाषाएँ-

आचार्य विश्वनाथ - "वाक्य स्यात् योग्यताकांक्षासन्निधिः युक्तः पदोच्चयः।" अर्थात् - "जिस वाक्य में योग्यता और आकांक्षा के तत्त्व विद्यमान हो वह पद समुच्चय वाक्य कहलाता है।"

पतंजलि "पूर्ण अर्थ की प्रतीति कराने वाले शब्द-समूह को वाक्य कहते हैं।"

प्रो देवेन्द्रनाथ शर्मा "भाषा की न्यूनतम पूर्ण सार्थक इकाई वाक्य है।"

कार्ल एफ सुंडन - "वाक्य बोली का एक अंश है अर्थात् श्रोता के समक्ष अभिप्रेत को, जो सत्य है, प्रस्तुत किया जाता है।"

वाक्य के तत्त्व-

विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा है। वाक्य में अभिव्यक्ति का तत्त्व होना आवश्यक है। वाक्य में ध्वनि तथा लिपि उसके बाह्य रूप हैं, शरीर हैं। अर्थ उसके प्राण हैं। शरीर व प्राण की तरह वाक्य में अर्थ तत्त्व, ध्वनि तत्त्व होना चाहिए। वाक्य में शब्दों का उचित क्रम होना चाहिए। इस प्रकार वाक्य-विन्यास में निम्न तत्त्वों का समावेश आवश्यक है-

(1) सार्थकता-

वाक्य में सदैव सार्थक शब्दों का ही प्रयोग होना चाहिए। निरर्थक शब्द तभी आते हैं, जब वे वाक्य में कुछ अर्थपूर्ण स्थिति में होते हैं, जैसे- बक-बक, अपने आप में निरर्थक शब्द हैं। जब ये शब्द किसी प्रश्नवाचक के साथ प्रयुक्त किए जाएँ, जैसे- 'क्या बक बक लगा रखी है?' तो इन शब्दों में सार्थकता आ जाती है।

(2) योग्यता-

वाक्य के शब्दों (पदों) का प्रसंग के अनुकूल भाव-बोध अर्थात् अर्थ ज्ञान कराने की क्षमता ही 'योग्यता' कहलाती है। वाक्य में वाक् मर्यादा अथवा जीवन के अनुभव के विरुद्ध कोई बात नहीं कही जानी चाहिए। यदि वाक्य में व्यक्त अर्थ में असंगति होगी, तो वाक्य अपूर्ण कहा जाएगा। जैसे- 1. माली आग से उद्यान सींचता है।

2. हाथी को रस्सी से बाँधा है।

उक्त वाक्यों में पहले वाक्य में योग्यता का अभाव है क्योंकि आग का कार्य जलाना है, उसमें सींचने की योग्यता नहीं होती। दूसरे वाक्य में हाथी को रस्सी से बाँधने की बात भी अनुचित है क्योंकि वह लोहे की जंजीरों से बाँधा जाता है। अतः दोनों वाक्यों में भाव या अर्थ की असंगति है। अतः ये वाक्य नहीं हैं।

(3) आकांक्षा-

आकांक्षा का अर्थ है- श्रोता की जिज्ञासा। वाक्य के शब्द एक दूसरे पर आश्रित रहते हैं। इसलिए वाक्य के किसी भाव को पूर्ण रूप से समझने के लिए एक शब्द को सुनकर अन्य शब्दों को सुनने की उत्कण्ठा सहज उत्पन्न होती है। इसे ही आकांक्षा कहा जाता है। जैसे- भूखे बच्चे से माता कुछ शब्द 'हाँ बेटा' कह दे, तो बच्चा अगला शब्द- 'दूध लाती हूँ' सुनने को लालायित रहेगा, जब तक माता से 'दूध लाती हूँ वाक्य को पूरा न सुन ले। यही आकांक्षा है, इसके बिना वाक्य पूर्ण नहीं होता।

(4) आसक्ति या निकटता-

आशक्ति का आशय है कि एक शब्द का जब उच्चारण किया जाए तो उसी समय अन्य शब्दों का भी उच्चारण किया जाए। वाक्य में योग्यता और आकांक्षा के साथ शब्दों में परस्पर सान्निध्य भी आवश्यक है अन्यथा अर्थ समझने में कठिनाई होती है। जैसे- हम आज कहें- वायुयान और कल कहें- उड़ता है, तो निश्चित रूप से अर्थ स्पस्ट नहीं होगा इसलिए दोनों पदों का समीप होना आवश्यक है तभी 'वायुयान उड़ता है', वाक्य पूर्ण होगा। रुक-रुककर बोले गए शब्द वाक्य की संज्ञा धारण नहीं कर सकते।

(5) पदक्रम-

वाक्यों में प्रयोग करने के लिए शब्दों का सही व्याकरणानुसार यथाक्रम प्रयोग करना आवश्यक है। पदक्रम के अभाव में कुछ का कुछ अर्थ निकल जाता है और इस प्रकार विचारों का सही सम्प्रेषण नहीं हो पाता। जैसे- 'खरगोश को काटकर गाजर खिलाओ।' वाक्य में पदक्रम का दोष होने से अर्थ का अनर्थ हो रहा है। अतः इसे 'खरगोश को गाजर काटकर खिलाओ' लिखने से सही अर्थ बोध होगा।

(6) अन्वय-

अन्वय शब्द का अर्थ है- मेल। वाक्य में क्रिया के साथ लिँग, वचन, कारक, पुरुष, काल आदि का अनुकरणात्मक व व्याकरणात्मक मेल होना आवश्यक है। जैसे- मछलियाँ पानी में तैर रही हैं। यहाँ 'मछलियाँ (कर्त्ता पद) प्रथम क्रम पर है तथा 'तैर रही हैं' अन्तिम क्रम पर और 'पानी में' (स्थानवाचक क्रियाविशेषण) मध्यम क्रम पर है। अतः उचित अन्वय के कारण यह वाक्य पूर्ण सार्थक सिद्ध हुआ।

वाक्य के साहित्य सम्बन्धी गुण-

(1) स्पष्टता
(2) समर्थता
(3) श्रुतिमधुरता
(4) लचीलापन
(5) विषय का ज्ञान।

वाक्य के अंग-

वाक्य-विन्यास करते समय जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, वे मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त रहते हैं, इसलिए वाक्य के दो अंग या घटक माने जाते हैं-

(1) उद्देश्य और
(2) विधेय।

(1) उद्देश्य- वाक्य में जिस व्यक्ति या वस्तु के सम्बन्ध में कुछ कहा जाता है, उसे उद्देश्य कहते हैं। अतः काम के करने वाले (कर्त्ता) को उद्देश्य कहते हैं। उद्देश्य प्रायः संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण शब्द होते हैं, कहीं पर क्रियार्थक शब्द भी उद्देश्य अंश बन जाता है। जैसे-

(1) रमेश गाँव जाएगा।
(2) अभिमानी का सर्वत्र आदर नहीं होता।
(3) घूमना स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहता है।

प्रथम वाक्य में, गाँव जाने का कार्य 'रमेश' कर रहा है। अतः रमेश उद्देश्य है। द्वितीय वाक्य में, अभिमानी का आदर न होना वर्णित है, इसमें 'अभिमानी' विशेषण-पद उद्देश्य है। तृतीय वाक्य में, 'घूमना क्रियार्थक शब्द है, जो कि वाक्य में उद्देश्य अंश की तरह प्रयुक्त है।

उद्देश्य का विस्तारक-

वाक्य में उद्देश्य अर्थात् कर्ता के साथ जो शब्द उसके विशेषण रूप में प्रयुक्त होते हैं, वे उद्देश्य के विस्तारक या पूरक कहलाते हैं। जैसे- लोभी व्यक्ति दुःखी रहता है। इस वाक्य में 'लोभी' शब्द 'व्यक्ति' का विशेषण है, इसलिए यह कत्र्ता अर्थात् 'व्यक्ति' का पूरक पद है। इस प्रकार उद्देश्य के अन्तर्गत कत्र्ता और कर्त्ता का विस्तार दोनों आते हैं। उद्देश्य विस्तारक में निम्न प्रकार के शब्द हो सकते हैं

(1) संज्ञा या सर्वनाम (सम्बन्ध कारक के रूप में)। जैसे रमेश की घड़ी चोरी चली गई, वाक्य में 'रमेश की'।
(2) सार्वनामिक विशेषण। जैसे वह बालक चला गया, वाक्य में 'वह'। 
(3) विशेष! जैसे- अच्छा लड़का प्यारा लगता है, वाक्य में 'अच्छा'।
(4) कृदन्त (सम्बन्ध कारक के रूप में)। जैसे- मेरा लिखा हुआ पत्र कहाँ है?, वाक्य में 'लिखा हुआ।
(5) कृदन्त का विशेषण। जैसे अधिक खेलना अच्छा नहीं होता, वाक्य में 'अधिक'। 
(6) समानाधिकरण शब्द (समानार्थी) का अर्थ स्पष्ट करने वाला शब्द। जैसे- गोपाल का भाई सत्यपाल पास हो गया, वाक्य में 'गोपाल का भाई।

(2) विधेय-

वाक्य में उद्देश्य के सम्बन्ध में जो कुछ कहा जाता है, उसे विधेय कहते हैं। वाक्य में क्रिया और उसका पूरक विधेय होता है। जैसे-

(1) आदमी जा रहा था।
(2) वह पढ़ते-पढ़ते सो गया।
(3) गीता लिखती है।

इन वाक्यों में 'जा रहा था', 'सो गया' और 'लिखती है' विधेय अंश हैं, इनसे उद्देश्य के कार्य का ज्ञान होता है।

विधेय का विस्तारक- वाक्य में क्रिया की विशेषता बताने वाले पदों को विधेय का विस्तारक कहते हैं। कभी-कभी क्रिया के विस्तारक के साथ कुछ पूरक पद भी आते हैं, जो कि कर्त्ता कारक

को छोड़कर अन्य विभक्तियों के होते हैं। उनको भी विधेय के पूरक एवं विस्तारक भाग में रखा जाता है।

जैसे-

'पुस्तक मेज के ऊपर रखी है।' इस वाक्य में 'रखी है' विधेय है तथा 'मेज के ऊपर' विधेय का पूरक या विस्तारक है।

(1 )  विधेय-विस्तारक में निम्न प्रकार के शब्द हो सकते हैं-

क्रिया विशेषण। जैसे मुरली कल चला गया, वाक्य में 'कल'।

(2) संज्ञा अथवा सर्वनाम (करण, अपादाना या अधिकरण कारक के रूप में)।

जैसे- मैं कलम से लिख रहा हूँ, वाक्य में 'कलम से'।

(3) कृदन्त। जैसे- दौड़ता हुआ गया, वाक्य में 'दौड़ता हुआ'।

(4) अकर्मक क्रिया का पूरक शब्द। जैसे- वह फल खराब हो गया, वाक्य में 'खराब'।

(5) सकर्मक क्रिया का कर्म। जैसे- साधना ने पुस्तक पढ़ ली, वाक्य में 'पुस्तक'। 

(6) सकर्मक क्रिया के कर्म का पूरक। जैसे- राम ने सुग्रीव को मित्र बनाया, वाक्य में 'मित्र'।

(7) सम्प्रदान कारक। जैसे मैं सरोज के लिए मिठाई लाया, वाक्य में 'सरोज के लिए'।

वाक्य और उपवाक्य-

वाक्य उस शब्द-समूह को कहते हैं जिसमें कर्त्ता और क्रिया दोनों होते हैं। जैसे- मोहन खेलता है। इसमें मोहन कर्त्ता और खेलता है- क्रिया है। इस वाक्य से पूरा अर्थ- बोध होता है। अतः यह एक वाक्य है।

कभी-कभी एक वाक्य में अनेक वाक्य होते हैं। इसमें एक वाक्य तो प्रधान वाक्य होता है और शेष उपवाक्य।

जैसे- 

मोहन ने कहा कि मैं खेलूँगा।

इसमें 'मोहन ने कहाँ प्रधान वाक्य है और 'कि मैं खेलूँगा उपवाक्य। उपवाक्य, वाक्य का भाग होता है, जिसका अपना अर्थ होता है और जिसमें उद्देश्य और विधेय भी होते उपवाक्यों के आरम्भ में अधिकतर कि, जिससे, ताकि, जो, जितना, ज्यों-ज्यों, चूंकि, क्योंकि, यदि, यद्यपि, जब, जहाँ, इत्यादि होते हैं।

उपवाक्य तीन प्रकार के होते हैं-

1) संज्ञा उपवाक्य-

( जो आश्रित उपवाक्य संज्ञा की तरह व्यवहृत हो, उसे संज्ञा उपवाक्य कहते हैं। इस उपवाक्य के पूर्व प्रायः कि' होता है। जैसे- राम ने कहा कि मैं खेलूँगा। यहाँ 'मैं खेलूँगा' संज्ञा उपवाक्य है।

(2) विशेषण उपवाक्य-

जो आश्रित उपवाक्य विशेषण की तरह व्यवहार में आये, उसे विशेषण उपवाक्य कहते हैं। जैसे- जो आदमी कल आया था, आज भी आया है। यहाँ 'जो कल आया था

विशेषण उपवाक्य है। इसमें जो, जैसा, जितना इत्यादि शब्दों का प्रयोग होता है।

(3) क्रियाविशेषण उपवाक्य- 

जो उपवाक्य क्रिया विशेषण की तरह व्यवहार में आये, उसे क्रिया विशेषण उपवाक्य कहते हैं। जैसे- जब पानी बरसता है, तब मेंढक बोलते हैं। यहाँ जब पानी बरसता है' क्रिया विशेषण उपवाक्य है। इसमें प्रायः जब, जहाँ, जिधर, ज्यों, यद्यपि इत्यादि शब्दों का प्रयोग होता है।

वाक्य के भेद: वाक्य के भेद निम्नांकित तीन आधार पर किए जाते हैं- 

1. रचना के आधार, पर
2. अर्थ के आधार पर, 
3. क्रिया के आधार पर।

रचना के आधार पर वाक्य के भेद-

1. सरल वाक्य-

जिस वाक्य में एक उद्देश्य, एक विधेय और एक ही मुख्य क्रिया हो, उसे सरल या साधारण वाक्य कहते हैं।

जैसे-

  • बिजली चमक ती है।
  • पानी बरस रहा है।
  • सूर्य निकल रहा है।
  • वह पुस्तक पढ़ता है।
  • छात्र मैदान में खेल रहे हैं।

इन वाक्यों में एक ही उद्देश्य और एक ही विधेय है अतः ये सरल या साधारण वाक्य हैं।

2. मिश्र वाक्य-

जिस वाक्य में मुख्य उद्देश्य और मुख्य विधेय के अलाव एक या अधिक समापिका क्रियाएँ हों, उसे मिश्र वाक्य कहते हैं। मिश्र वाक्यों की रचना एक से अधिक ऐसे साधारण वाक्यों से होती है, जिनमें एक प्रधान तथा अन्य वाक्य गौण (आश्रित) हों। इस तरह मिश्रित वाक्य में एक मुख्य उपवाक्य और उस मुख्य उपवाक्य के आश्रित एक अथवा एक से अधिक उपवाक्य हैं।

जैसे-

इस वाक्य में 'वह कौन-सा मनुष्य है' मुख्य वाक्य है और शेष सहायक वाक्य क्योंकि वह मुख्य वाक्य पर आश्रित है।

अन्य उदाहरण-

  • वह कौन-सा मनुष्य है जिसने महाप्रतापी राजा भोज का नाम न सुना हो।
  • मालिक ने कहा कि कल छुट्टी रहेगी।
  • मोहन लाल, जो श्याम गली में रहता है, मेरा मित्र है।
  • ऊँट ही एक ऐसा पशु है जो कई दिनों तक प्यासा रह सकता है।
  • यह वही भारत देश है जिसे पहले सोने की चिड़िया कहा जाता था।

आश्रित उपवाक्य (गौण उपवाक्य)-

मिश्र वाक्य में आने वाले आश्रित (गौण) उपवाक्य तीन प्रकार के होते हैं-

(1) संज्ञा उपवाक्य-

जो अपने प्रधान उपवाक्य में प्रयुक्त उद्देश्य का, क्रिया का, कर्म या पूरक का समानाधिकरण होता है, उसे संज्ञा उपवाक्य कहते हैं। प्रायः संज्ञा उपवाक्य समुच्चय बोधक

अव्यय 'कि' से जुड़ा रहता है।

जैसे-

  • हमारा विश्वास था कि भारत मैच जीत लेगा।
  • मैं नहीं जानता कि वह कहाँ है।
  • वकील ने फटकारते हुए कहा कि वह झूठा है।

विशेष-उद्धरण चिह्नों में बंद उपवाक्य भी संज्ञा उपवाक्य होते हैं।

जैसे-

सुषमा ने कहा, "आज मेरा जन्म दिन है।" 

विद्यार्थी ने कहा, "मैं विद्यालय जाऊँगा।"

(2) विशेषण उपवाक्य-

जो अपने प्रधान उपवाक्य के किसी संज्ञा या सर्वनाम शब्द की विशेषता बताता है, उसे विशेषण उपवाक्य कहते हैं।

जैसे-

  • जो बात सुनो उसे समझो।
  • यह वही छात्र है, जो मेरे स्कूल स्कूल में पढ़ता था।

इनमें 'जो', 'उसे' तथा 'यह' शब्द दोनों उपवाक्यों को जोड़ रहे हैं तथा सर्वनाम की विशेषता बता रहे हैं।

(3 ) क्रियाविशेषण उपवाक्य-

जो अपने प्रधान उपवाक्य के क्रिया शब्द की विशेषता बताता है या क्रियाविशेषण का समानाधिकरण होता है, उसे क्रियाविशेषण उपवाक्य कहते हैं।

जैसे-

  • जब-जब वर्षा होगी, तब-तब हरियाली फैलेगी।
  • यदि वह पढ़ेगा नहीं, तो उत्तीर्ण कैसे होगा?

इन वाक्यों में जब-जब, तब-तब, यदि, तो- क्रियाविशेषण की तरह प्रयुक्त होकर प्रधान उपवाक्य की क्रिया की विशेषता बता रहे हैं।

समानाधिकरण उपवाक्य-

जो उपवाक्य प्रधान उपवाक्य या आश्रित उपवाक्य के समान अधिकरण वाला हो, अर्थात् एक पूर्ण वाक्य में दो उपवाक्य हों और दोनों ही प्रधान हों, उसे समानाधिकरण उपवाक्य कहते हैं। इन उपवाक्यों में संयोजक अव्यय शब्दों का प्रयोग होता है।

जैसे-

  • रामदीन निर्धन है, किन्तु है परिश्रमी। 
  • बुरी संगति मत करो, वरना बाद में पछताओगे।

3. जिस वाक्य में एक से अधिक साधारण या मिश्र वाक्य हों और वे किसी संयोजक अव्यय (किन्तु, परन्तु, बल्कि, और, अथवा, तथा, आदि) द्वारा जुड़े हों, तो ऐसे वाक्य को संयुक्त वाक्य कहते हैं।

जैसे-

  • राम पढ़ रहा था परन्तु रमेश सो रहा था।
  • शीला खेलने गई और रीता नहीं गई।

समय बहुत खराब है इसलिए सावधान रहना चाहिए।

संयुक्त वाक्य-

इन वाक्यों में 'परन्तु', 'और' व 'इसलिए' अव्यय पदों के द्वारा दोनों साधारण वाक्यों को जोड़ा गया है। यदि ऐसे वाक्यों में से इन योजक अव्यय शब्दों को हटा दिया जाए तो प्रत्येक वाक्य में दो-दो स्वतंत्र वाक्य बनते हैं। इसी कारण इन्हें संयुक्त या जुड़े हुए वाक्य कहते हैं।

अर्थ के आधार पर वाक्य के भेद-

अर्थ के आधार पर वाक्य के निम्नलिखित आठ भेद होते हैं-

1. विधिवाचक-

जिन वाक्यों में क्रिया के करने या होने का सामान्य कथन हो और ऐसे वाक्यों में किसी काम के होने या किसी के अस्तित्व का बोध होता हो, उन्हें विधिवाचक या

विधानवाचक वाक्य कहते हैं।

जैसे-

  • सूर्य गर्मी देता है। 
  • हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है।
  • भारत हमारा देश है। वह बालक है।
  • हिमालय भारत के उत्तर दिशा में स्थित है।

उक्त वाक्यों में सूर्य का गर्मी देना, हिन्दी का राष्ट्र भाषा होना आदि कार्य हो रहे हैं और किसी के (देश तथा बालक) होने का बोध हो रहा है। अतः ये विधिवाचक वाक्य हैं।

2 जिन वाक्यों में कार्य के निषेध (न होने) का बोध होता हो, उन्हें निषेधवाचक वाक्य अथवा नकारात्मक वाक्य कहते हैं।

जैसे-

निषेधवाचक-

  • मैं वहाँ नहीं जाऊँगा। 
  • वे यह कार्य नहीं जानते हैं।
  • बसन्ती नहीं नाचेगी।

आज हिन्दी अध्यापक ने कक्षा नहीं ली।

उक्त सभी वाक्यों में क्रिया सम्पन्न नहीं होने के कारण ये निषेधवाचक वाक्य हैं।

3. आज्ञावाचक- जिन वाक्यों से आदेश या आज्ञा या अनुमति का बोध हो, उन्हें आज्ञावाचक वाक्य कहते हैं।

जैसे-

  • तुम वहाँ जाओ।
  • यह पाठ तुम पढ़ो।
  • अपना-अपना काम करो। 
  • आप चुप रहिए।
  • मैं घर जाऊँ। 
  • तुम पानी लाओ।

4. प्रश्नवाचक-

जिन वाक्यों में कोई प्रश्न किया जाये या किसी से कोई बात पूछी जाये, उन्हें प्रश्नवाचक वाक्य कहते हैं।

जैसे-

  • तुम्हारा क्या नाम है?
  • तुम पढ़ने कब जाओगे?
  • वे कहाँ गए हैं?
  • क्या तुम मेरे साथ गाओगे?

5. विस्मयबोधक-

जिन वाक्यों में आश्चर्य, हर्ष, शोक, घृणा आदि के भाव व्यक्त हों, उन्हें विस्मयबोधक वाक्य कहते हैं।

जैसे-

  • अरे! इतनी लम्बी रेलगाड़ी!
  • ओह! बड़ा जुल्म हुआ! 
  • छिः ! कितना गन्दा दृश्य !
  • शाबाश! बहुत अच्छे !

उक्त वाक्यों में आश्चर्य (अरे), दुःख (ओह), घृणा (छिः), हर्ष (शाबाश) आदि भाव व्यक्त किए गए हैं अतः ये विस्मयबोधक वाक्य हैं।

6. संदेह बोधक-

जिन वाक्यों में कार्य के होने में सन्देह अथवा सम्भावना का बोध हो, उन्हें संदेह वाचक वाक्य कहते हैं।

जैसे-

  • सम्भवतः वह सुधर जाय।
  • शायद मैं कल बाहर जाऊँ।
  • आज वर्षा हो सकती है।
  • शायद वह मान जाए।

उक्त वाक्यों में कार्य के होने में अनिश्चितता व्यक्त हो रही है अतः ये संदेह वाचक वाक्य हैं।

7. इच्छावाचक-

जिन वाक्यों में वक्ता की किसी इच्छा, आशा या आशीर्वाद का बोध होता है, उन्हें इच्छावाचक वाक्य कहते हैं।

जैसे-

  • भगवान तुम्हें दीर्घायु करे।
  • नववर्ष मंगलमय हो।
  • ईश्वर करे, स सब कुशल लौटें। तौं फलो। 
  • दूधों नहाओ, पूतों
  • कल्याण हो।

इन वाक्यों में वक्ता ईश्वर से दीर्घायु, नववर्ष के मंगलमय, सबकी सकुशल वापसी और पशुधन व पुत्र धन की कामना व आशीष दे रहा है अतः ये इच्छावाचक वाक्य हैं।

8. संकेत वाचक-

जिन वाक्यों से एक क्रिया के दूसरी क्रिया पर निर्भर होने का बोध हो, उन्हें संकेत वाचक या हेतुवाचक वाक्य कहते हैं।

जैसे-

  • वर्षा होती तो फसल अच्छी होती।
  • आप आते तो इतनी परेशानी नहीं होती।
  • जो पढ़ेगा वह उत्तीर्ण होगा।

यदि छुट्टियाँ हुईं तो हम कश्मीर अवश्य जाएँगे।

इन वाक्यों में कारण व शर्त का बोध हुआ है इसलिए ऐसे सभी वाक्य संकेत वाचक वाक्य कहलाते हैं।

क्रिया के आधार पर वाक्य के भेद- क्रिया के आधार पर वाक्य तीन प्रकार के होते हैं-

(1) कर्तृप्रधान वाक्य (कर्तृवाच्य)- ऐसे वाक्यों में क्रिया कर्त्ता के लिँग, वचन और पुरुष के अनुसार होती है।

जैसे-

  • बालक पुस्तक पढ़ता है।
  • बच्चे खेल रहे हैं।

( 2 ) कर्मप्रधान वाक्य (कर्मवाच्य)-

इन वाक्यों में क्रिया कर्म के अनुसार होती है तथा क्रिया के लिँग, वचन कर्म के अनुसार होते हैं। क्रिया सकर्मक होती है।

जैसे-

  • बालकों द्वारा पुस्तक पढ़ी जाती है।
  • यह पुस्तक मेरे द्वारा लिखी गई।

( 3) भावप्रधान वाक्य (भाववाच्य)-

ऐसे वाक्यों में कर्म नहीं होता तथा क्रिया सदा अकर्मक, एकवचन, पुल्लिंग तथा अन्यपुरुष में प्रयोग की जाती है। इनमें भाव (क्रिया) की प्रधानता रहती है।

जैसे-

  • मुझसे अब नहीं चला जाता।
  • हाँ कैसे बैठा जाएगा।

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