सिंधु घाटी सभ्यता और इसका विस्तार नोट्स

सिंधु घाटी सभ्यता और इसका विस्तार

सिंधु घाटी सभ्यता और इसका विस्तार नोट्स

सिंधु घाटी सभ्यता – (2500 ई० पू० – 1750 ई० पू०)

सिंधु घाटी सभ्यता का नामकरण

सिंधु घाटी सभ्यता का क्षेत्र अत्यंत व्यापक था। आरंभ में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से इस सभ्यता के प्रमाण मिले हैं अतः विद्वानों ने इसे सिंधु घाटी सभ्यता का नाम दिया, क्योंकि ये क्षेत्र सिंधु और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में आते हैं, पर बाद में रोपड़, लोथल, कालीबंगा, बनावली, रंगपुर आदि क्षेत्रों में भी इस सभ्यता के अवशेष मिले जो सिंधु और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र से बाहर थे। अतः इतिहासकार, इस सभ्यता का प्रमुख केंद्र हड़प्पा होने के कारण इस सभ्यता को ‘हड़प्पा की सभ्यता’ नाम देना उचित मानते हैं।

भौगोलिक विस्तार

  • मांडा जम्मू – कश्मीर (उत्तरी सीमा)
  • सुतकागेंडोर – बलूचिस्तान (पश्चिमी सीमा)
  • आलमगीरपुर – उत्तर प्रदेश (पूर्वी सीमा)
  • दैमाबाद – महाराष्ट्र (दक्षिणी सीमा

सिंधु सभ्यता की खोज

वर्ष 1921 में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में पुरातत्त्वविद् दयाराम साहनी ने उत्खनन कर इसके प्रमुख नगर ‘हड़प्पा’ का पता लगाया।
सर्वप्रथम हड़प्पा स्थल की खोज के कारण इसका नाम ‘हड़प्पा सभ्यता’ रखा गया।
रेडियो कार्बन-14 (C14) जैसी नवीन विश्लेषण पद्धति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता का काल निर्धारण 2500 ई.पू. से 1750 ई.पू. माना गया है। यह सभ्यता 400-500 वर्षों तक विद्यमान रही तथा 2200 ई.पू. से 2000 ई.पू. के मध्य तक यह अपनी परिपक्व अवस्था में थी।
नवीन शोध के अनुसार यह सभ्यता लगभग 8,000 साल पुरानी है।
NOTE – सर जॉन मार्शल के दिशानिर्देश में ही राखालदास बनर्जी द्वारा सिंधु – घाटी सभ्यता के स्थल मोहनजोदड़ो की खोज 1922 में की गई

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल

  • हड़प्पा सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों की खोज सर्वप्रथम 1921 ई. में हड़प्पा में की गई।
हड़प्पा वर्तमान में रावी नदी के बायें तट पर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मोंटगोमरी जिले में स्थित है।
स्टुअर्ट पिग्गट ने इसे ‘अर्द्ध औद्योगिक नगर’ कहा है।
यहाँ के निवासियों का एक बड़ा भाग व्यापार, तकनीकी उत्पाद और धर्म के कार्यों में संलग्न था।
उन्होंने हड़प्पा व मोहनजोदड़ो को ‘एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वाँ राजधानी’ कहा था।
नगर की रक्षा के लिये पश्चिम की ओर एक दुर्ग का निर्माण किया गया था।
यह दुर्ग उत्तर से दक्षिण की ओर 415 मीटर लंबा तथा पूर्व से पश्चिम की ओर 195 मीटर चौड़ा है।
जिस टीले पर यह दुर्ग बना है उसे व्हीलर ने ‘माउंड ए-बी’ (Mound A-B) की संज्ञा प्रदान की है।

  • मोहनजोदड़ो

इसका सिंधी भाषा में अर्थ ‘मृतकों का टीला’ होता है।
यह सिंधु (पाकिस्तान) के लरकाना जिले में सिंधु नदी के तट पर स्थित है।
सर्वप्रथम इसकी खोज राखालदास बनर्जी ने 1922 ई. में की थी।
मोहनजोदड़ो की शासन व्यवस्था राजतंत्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक थी ।
वृहद् स्नानागार, मोहनजोदड़ो का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल है।
इसके केंद्रीय खुले प्रांगण के बीच जलकुंड या जलाशय बना है

  • चन्हूदड़ों

यह सैंधव नगर मोहनजोदड़ो से 130 किमी. दक्षिण-पूर्व सिंध प्रांत (पाकिस्तान) में स्थित है।
इसकी सर्वप्रथम खोज 1934 ई. में एन. गोपाल मजूमदार ने की थी तथा 1935 ई. में अर्नेस्ट मैके द्वारा यहाँ उत्खनन करवाया गया
चन्हूदड़ो एकमात्र पुरास्थल है, जहाँ से वक्राकार ईंटें मिली हैं।
चन्हृदड़ों में किसी दुर्ग का अस्तित्व नहीं मिला है।
चन्हृदड़ो से पूर्वोत्तर हड़प्पाकालीन संस्कृति (झूकर-झाँगर) के अवशेष मिले हैं
अर्नेस्ट मैके ने यहाँ से मनका बनाने का कारखाना तथा भट्टी की खोज की है

  • लोथल

यह गुजरात के अहमदाबाद जिले के सरगवाला ग्राम के समीप दक्षिण में भोगवा नदी के तट पर स्थित है।
इसकी खोज सर्वप्रथम डॉ. एस.आर. राव ने 1955 ई. में की थी।
यह स्थल एक प्रमुख बंदरगाह था, जो पश्चिमी एशिया से व्यापार का प्रमुख स्थल था
लोथल में नगर को दो भागों में न बाँटकर एक ही रक्षा प्राचीर से पूरे नगर को दुर्गीकृत किया गया था।

  • राखीगढ़ी

हरियाणा के हिसार जिले में स्थित प्रमुख पुरातात्विक स्थल ।
यहाँ से अन्नागार एवं रक्षा प्राचीर के साक्ष्य मिले हैं
मई 2012 में ‘ग्लोबल हैरिटेज फंड’ ने इसे एश्यिा के दस ऐसे ‘विरासत-स्थलों’ की सूची में शामिल किया है, जिनके नष्ट हो जाने का खतरा है।

  • कालीबंगा

यह राजस्थान के गंगानगर जिले में घग्घर नदी के बायें तट पर है।
कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ काले रंग की चूड़ियाँ’ हैं।
इसकी खोज 1951 में अमलानंद घोष द्वारा की गई तथा 1961 ई. में बी.बी. लाल और बी. के. थापर के निर्देशन में व्यापक खुदाई की गई।
यहाँ से जुते हुए खेत का साक्ष्य मिला है।
यहाँ के भवनों का निर्माण कच्ची ईंटों द्वारा हुआ था; यहाँ से अलंकृत ईंटों के साक्ष्य भी मिले हैं।

  • धौलावीरा

यह गुजरात के कच्छ जिले के भचाऊ तालुका में स्थित है।
इसकी खोज 1967 ई. में जे.पी. जोशी ने की थी।
यहाँ से प्राप्त होने वाली सिंधु लिपि के 10 बड़े चिह्नों से निर्मित शिलालेख महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
धौलावीरा के निवासी जल संरक्षण की तकनीक से परिचित थे।
नगर तीन भागों में विभाजित था- दुर्गाभाग, मध्यम नगर तथा निचला नगर ।
धौलावीरा से हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र स्टेडियम (खेल का मैदान) मिला है।


NOTE – खोज – जेपी जोशी और आर एस विष्ट ने की थी।

हड़प्पाई लिपि

हड़प्पाई लिपि में लगभग 64 मूल चिह्न हैं जो सेलखड़ी की आयताकार मुहरों, तांबे की गुटिकाओं आदि पर मिलते हैं। इसकी लिपि पिक्टोग्राफ / चित्रात्मक थी जो दाईं ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी। इस पद्धति को बूस्ट्रोफेडन कहा गया है।
इस लिपि का सबसे पुराना नमूना 1853 ई. में मिला था और 1923 ई. तक पूरी लिपि प्रकाश में आ गई थी, परंतु अभी तक इसको पढ़ा नहीं जा सका है।

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