महाजनपद काल का संक्षिप्त इतिहास तथा इसका उदय

महाजनपद काल का संक्षिप्त इतिहास तथा इसका उदय

महाजनपदों की कुल संख्या 16 थी, जिसका उल्लेख बौद्ध ग्रंथ 'अंगुत्तर निकाय', 'महावस्तु' एवं जैन ग्रंथ 'भगवती सूत्र' में मिलता है। इसमें मगध, कौशल, वत्स और अवंति सर्वाधिक शक्तिशाली थे। सोलह महाजनपदों में अश्मक ही एक ऐसा जनपद था जो दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के किनारे स्थित था। इन 16 महाजनपदों में वज्जि एवं मल्ल में गणतंत्रात्मक व्यवस्था थी, जबकि शेष में राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी। महापरिनिर्वाणसुत्त में 6 महानगरों की सूचना मिलती है- चंपा, राजगृह, ज्ञात होता है कि श्रावस्ती, काशी, कौशांबी तथा साकेत । इस काल में मगध ने अन्य महाजनपदों को जीतकर मगध साम्राज्य का निर्माण किया।

महाजनपद

राजधानी
काशी वाराणसी
अंग चंपा (भागलपुर एवं मुंगेर)
कौशल श्रावस्ती/अयोध्या (फैज़ाबाद मंडल)
मगध राजगृह/गिरिव्रज (दक्षिणी बिहार)
मल्ल कुशीनगर (प्रथम भाग) एवं पावा (द्वितीय भाग)
चेदि/चेति सोत्थिवती / सुक्तिमति (आधुनिक बुंदेलखंड)
वत्स कौशांबी (इलाहाबाद एवं बांदा)
पांचाल उत्तरी पांचाल-अहिच्छत्र (रामनगर, बरेली) & फरुर्खाबाद
मत्स्य विराट नगर [अलवर, भरतपुर (राजस्थान)]
शूरसेन मथुरा (आधुनिक ब्रजमंडल)
अश्मक पोतना या पोटली (दक्षिण भारत का एकमात्र महाजनपद)
आवन्ति उत्तरी उज्जयिनी, दक्षिणी महिष्मती
गांधार तक्षशिला [पेशावर तथा रावलपिंडी (पाकिस्तान)
कंबोज राजपुर/हाटक (कश्मीर)
कुरु इंद्रप्रस्थ (मेरठ तथा दक्षिण-पूर्व हरियाणा)
वज्जि  वेरशाली ( उत्तरी बिहार ) 

बिम्बिसार इस वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक था। उसे मगध साम्राज्य की सत्ता का वास्तविक संस्थापक भी माना जाता है। 15 वर्ष की आयु में मगध साम्राज्य की बागडोर संभालने वाले बिम्बिसार ने लगभग 52 वर्षों तक शासन किया। इसके शासनकाल में मगध ने विशिष्ट स्थान प्राप्त किया !

अजातशत्रु (492 ई.पू. से 460 ई.पू.)

बिम्बिसार की हत्या उसके पुत्र अजातशत्रु ने कर दी और वह 492 ई.पू. में मगध की राजगद्दी पर बैठा अजातशत्रु का कोशल नरेश प्रसेनजित से युद्ध हुआ। प्रसेनजित की पराजय हुई, पर बाद में समझौता हो गया ।

NOTE - प्रसेनजित ने अपनी पुत्री वाजिरा का विवाह अजातशत्रु से किया।

अजातशत्रु का उपनाम 'कुणिक' था। अजातशत्रु जैन मतानुयायी था ।

अजातशत्रु के समय में ही राजगृह की सप्तपणि गुफा में प्रथम बौद्ध संगोति का आयोजन हुआ था। 

अजातशत्रु ने 32 वर्षों तक मगध पर शासन किया। (पुराणों के अनुसार 28 वर्ष)

32 वर्षों तक शासन करने के बाद अजातशत्रु अपने पुत्र उदायिन द्वारा मार डाला गया।

उदायिन (460 ई.पू. से 444 ई.पू.)

पुराणों एवं जैन ग्रंथों के अनुसार उदायिन ने गंगा तथा सोन नदियों के संगम तट पर पाटलिपुत्र (कुसुमपुरा) नामक नगर की स्थापना की तथा उसे अपनी राजधानी बनाया। वह जैन मतानुयायी था !

नोटः हर्यक वंश का अंतिम राजा उदायिन का पुत्र नागदशक था। इसको उसके आमत्य शिशुनाग ने पदच्युत कर मगध की गद्दी पर अधिकार कर लिया और 'शिशुनाग' नामक एक नए वंश की नींव रखी। 

शिशुनाग वंश (412 ई.पू. से 344 ई.पू.)

इस वंश का संस्थापक शिशुनाग को माना जाता है। इसी के नाम पर इस वंश का नाम 'शिशुनाग वंश' पड़ा।

शिशुनाग (412 ई.पू. से 394 ई.पू.)

इसने अवंति तथा वत्स राज्य पर अधिकार कर उसे मगध साम्राज्य में मिला लिया। इसने वैशाली को राजधानी बनाया।

इसके शासन के समय मगध साम्राज्य के अंतर्गत बंगाल से लेका मालवा तक का भू-भाग सम्मिलित था - महावंश के अनुसार, शिशुनाग की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र कालाशोक गद्दी पर बैठा।

कालाशोक (394 ई.पू. से 366 ई.पू.)

इसका नाम 'पुराण' तथा 'दिव्यावदान' में काकवर्ण मिलता है।

इसने वैशाली के स्थान पर पुनः पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बनाया। इसने 28 वर्षों तक शासन किया - इसी के समय द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में हुआ। इसो समय बौद्ध संघ दो भागों (स्थविर तथा महासाधिक) में बँट गया। 

बाणभट्ट रचित 'हर्षचरित' के अनुसार काकवर्ण को राजधानी पाटलिपुत्र में घूमते समय महापद्मनंद नामक व्यक्ति ने चाकू मारकर हत्या कर दी। 

महाबोधिवंश के अनुसार कालाशोक के दस पुत्र थे, जिन्होंने कालाशोक की मृत्यु (366 ई.पू.) के बाद मगध पर 22 वर्षों तक (लगभग 344 ई.पू.) शासन किया।

नंद वंश (344 ई.पू. से 324-23 ई.पू.)

संस्थापक - महापद्मनंद

पुराणों के अनुसार, इस वंश का संस्थापक महापद्मनंद एक शूद्र था। इसमें महापद्मनंद को 'सर्वक्षत्रांतक' (क्षत्रियों का नाश करने वाला) तथा 'भार्गव' (दूसरे परशुराम का अवतार) कहा गया है।

इसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की तथा 'एकराट' एवं 'एकक्षत्र' की उपाधि धारण की।

महापद्मनंद के आठ पुत्र थे। धनानंद भी इसका पुत्र था, जो नंद वंश का अंतिम शासक था।

घनानंद एक नज़र

यह सिकंदर का समकालीन था। इसके समय में 326 ई.पू. में सिकदर ने पश्चिमोत्तर भारत पर आक्रमण किया था। ग्रीक (यूनानी) लेखकों ने इसे 'अग्रमीज' कहा है।।

धनानंद ने जनता पर बहुत से कर आरोपित किये थे, जिससे जनता असंतुष्ट थी

धनानंद के दरबार में चाणक्य (तक्षशिला का आचार्य) आया था। वह धनानंद के द्वारा अपमानित किया गया

322 ई. पू. में चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरु चाणक्य की सहायता से धनानंद की हत्या कर मौर्य वंश की नींव रखी।

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